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         प्रीति    प्रीति सरिता की वह लहर है , सजग जो रहती आठों पहर है , जैसे पानी बहता रहता ही सदा , वैसे ही प्रीति न पाती ठहर है।       प्रीति का परिचय दिखावे से नहीं ,       प्रीति का संबंध अभिनय से नहीं ,       प्रीति में न झूठा बंधंन कोई ,       प्रीति में न प्रतिकूलता कोई। मिलती ही रहती है इसमें हार ही , हृदय फिर भी मानता आभार ही , पग न कोई प्रीति का कभी बहकता , प्रीति का पक्षी सदा ही चकहता।       मीत को अपने न प्रीति भूलती ,       वास्तविकता को है वह स्वीकारती ,       सुखद लगती है प्रीति शर्माई सी ,       लाल जोड़े में सजी दुल्हन सी । प्रीति एक ऐसी सुंदर कहानी है , अनुभूतियाँ इसकी बहुत सुहानी हैं , बाँसुरी प्रीति की बजती रहे सदा , ये ही आज सविता की ज़ुबानी है।           ...
Blog Archive ·     ▼   2015  (1) o   ▼   November  (1) § करवा चौथ पर कुछ हाइकु ·     ►   2014  (13) ·     ►   2013  (7) ·     ►   2012  (7) करवा चौथ पर कुछ हाइकु १   माथे बिंदिया हाथ सजे कंगन पूजता – मन २ निकला चंदा अर्ध्य दें सुहागनें रीत हो पूरी ३ पति को पाया साल में एक बार ये दिन आया ४   शृंगार किये सुहागिनों की टोली मंदिर चली ५ थालियाँ सजीं सुहागिनों की पूजा चंदा ने सुनी ६   नारियाँ सजें करवा चौथ पूजें पानी न चखें ७   पेट हैं खाली उमंगें भरे मन सजाएँ थाली ८ हाथों में दीप पति उम्र पाने को चंदा से भीख          सविता अग्रवाल "सवि" Posted by  Unknown  at  07:33   No comments:  Email This BlogThis! Share to Twitter Share to Facebook Share to Pinterest Monday, 29 December ...