प्रीति  
प्रीति सरिता की वह लहर है,
सजग जो रहती आठों पहर है,
जैसे पानी बहता रहता ही सदा,
वैसे ही प्रीति न पाती ठहर है।

      प्रीति का परिचय दिखावे से नहीं,
      प्रीति का संबंध अभिनय से नहीं,
      प्रीति में न झूठा बंधंन कोई,
      प्रीति में न प्रतिकूलता कोई।

मिलती ही रहती है इसमें हार ही,
हृदय फिर भी मानता आभार ही,
पग न कोई प्रीति का कभी बहकता,
प्रीति का पक्षी सदा ही चकहता।

      मीत को अपने न प्रीति भूलती,
      वास्तविकता को है वह स्वीकारती,
      सुखद लगती है प्रीति शर्माई सी,
      लाल जोड़े में सजी दुल्हन सी

प्रीति एक ऐसी सुंदर कहानी है,
अनुभूतियाँ इसकी बहुत सुहानी हैं,
बाँसुरी प्रीति की बजती रहे सदा,
ये ही आज सविता की ज़ुबानी है।
           सविता अग्रवाल 'सवि'

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