रात रिसती रही 

ठंडी, अँधेरी रात
नैनों में भरे
ख़्वाबों की बरसात
पलकें उनींदीं सी
रात के आलम में
झपकती रहीं
ख्याल चलते रहे
तन जगता रहा
दीया जलता रहा
रोशनी मद्धम
होती रही
लौ टिमटिमाती रही
पतंगे उड़ते रहे   
प्राण देते रहे
खिड़की पर ओस
आँसू सी बहती रही
हवाएँ शोर करती रहीं
मैं सिकुड़ती रही
बादल चलते रहे
चाँद को ढकते रहे
किसी के आने की
आहट को
कान तरसते रहे
हिया धड़कता रहा
मन तरसता रहा
यूँ ही रात रिसती रही
बस यूँ ही रिसती रही |

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