शरद परी (०६ दिसम्बर २०१९)
आ गयी है बाँध के पायल
छम छम करती शरद
कोई थर थर कांप रहा है
तो किसी का ह्रदय गद गद
पहन श्वेत वस्त्र परियों सा
वह नभ से उतर रही है
जादुई छड़ी हाथ में लेकर
जादू सा कर रही है
सुनसान थे जो गलियारे
और पात पड़े थे सूखे
लाकर नए रत्न अनोखे
वह उन सब में जड़ रही है
लाई है सौगातें अनगिन
शीत लहर का मौसम
पाना क्या चाहती है ये
चलती हवा सनन सन
धरती पर बिखराती मोती
आँचल में जो लाती
कभी कभी आँचल को भरने
फिर नभ में छिप जाती
धुंधली चादर ओढ़ के भारी
सूरज को ढक आती
बर्फ़ गिराती पृथ्वी पर और
नदियों को भर जाती
सूखी बंजर भूमि को यह
उर्वरक बनाती
सागर में पानी हो कितना
गुणा भाग कर लाती
बैठ पालकी में हवाओं की
ये धरा से मिलने आती
उपहारों की डलिया भर भर
संग में अपने लाती
धरती को दुल्हन सा करने
शृंगार अनेकों करती
आभूषण पहना कर सखि को
चांदी सा कर देती
दोनों सखियाँ मिल कर फिर यूँ
हँस हँस कर खिल जाती
कुछ दिन साथ बिताकर
परी फिर अपने देश को जाती
पानी की ना हो कमी धरा पर
जीवन प्रदान कर जाती
जीवन प्रदान कर जाती
सविता अग्रवाल ‘सवि’ कैनेडा
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