रात रिसती रही ठंडी , अँधेरी रात नैनों में भरे ख़्वाबों की बरसात पलकें उनींदीं सी रात के आलम में झपकती रहीं ख्याल चलते रहे तन जगता रहा दीया जलता रहा रोशनी मद्धम होती रही लौ टिमटिमाती रही पतंगे उड़ते रहे प्राण देते रहे खिड़की पर ओस आँसू सी बहती रही हवाएँ शोर करती रहीं मैं सिकुड़ती रही बादल चलते रहे चाँद को ढकते रहे किसी के आने की आहट को कान तरसते रहे हिया धड़कता रहा मन तरसता रहा यूँ ही रात रिसती रही बस यूँ ही रिसती रही |
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शरद परी (०६ दिसम्बर २०१९) आ गयी है बाँध के पायल छम छम करती शरद कोई थर थर कांप रहा है तो किसी का ह्रदय गद गद पहन श्वेत वस्त्र परियों सा वह नभ से उतर रही है जादुई छड़ी हाथ में लेकर जादू सा कर रही है सुनसान थे जो गलियारे और पात पड़े थे सूखे लाकर नए रत्न अनोखे वह उन सब में जड़ रही है लाई है सौगातें अनगिन शीत लहर का मौसम पाना क्या चाहती है ये चलती हवा सनन सन धरती पर बिखराती मोती आँचल में जो लाती कभी कभी आँचल को भरने फिर नभ में छिप जाती धुंधली चादर ओढ़ के भारी सूरज को ढक आती बर्फ़ गिराती पृथ्वी पर और नदियों को भर जाती सूखी बंजर भूमि को यह उर्वरक बनाती सागर में पानी हो कितना गुणा भाग कर लाती बैठ पालकी में हवाओं की ये धरा से मिलने आती उपहारों की डलिया भर भर संग में अपने लाती धरती को दुल्हन सा करने शृंगार अनेकों करती आभूषण पहना कर सखि को चांदी सा कर देती दोनों सखियाँ मिल कर फिर यूँ हँस हँस कर खिल जाती कुछ दिन साथ बिताकर परी फिर अपने देश को जाती पानी की ना हो कमी धरा पर जीवन ...
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पतझड़ को सांत्वना गर्मी का मौसम जाते ही वसुधा में भी थी हरियाली बैठा सूरज देख रहा सब सूझी उसको एक ठिठोली भर भर कर पिचकारी रंग की ऊपर से ही दे दे मारीं कहीं गुलाबी, पीला , नीला , लाल , जामुनी रंग बिखेरा कलाकार की कलाकृति सा कैनवास पर चित्र उकेरा देख देख कर एक दूजे को वृक्ष अपने से ही शरमाये लेकर बारिश की कुछ बूँदें धो धो तन को खूब नहाये रगड़ा तन को इतना तरु ने पत्ता भी एक टिक ना पाया हो क्रोध में लाल और पीला जाकर सूरज से वह बोला - खेल खेल कर तुमने होली अपना तो आनंद मनाया पर मेरी हालत तो देखो तिरस्कृत करके मुझे रुलाया धरती पर अब कोई मुझको देख नहीं खुश होता है मानव की जर्जर काया से मेरी उपमा करता है पतझड़ में आक्रोश था इतना कचहरी में सूरज को लाया इलज़ाम लगाये उसने इतने सुनकर सब, सूरज मुस्काया छोड़ छाड़ कर जिरह कचहरी सूरज पतझड़ के संग आया गले लगाया, चूमा माथा पतझड़ को उसने सहलाया छोड़ क्रोध अब सोचो तुम भी कितने रंग दिए हैं तुमको देख तुम्हारे रंग अनोखे जग सारा कितना हर्षाया बोला सूरज पतझड़ से तब सम...
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प्रीति प्रीति सरिता की वह लहर है , सजग जो रहती आठों पहर है , जैसे पानी बहता रहता ही सदा , वैसे ही प्रीति न पाती ठहर है। प्रीति का परिचय दिखावे से नहीं , प्रीति का संबंध अभिनय से नहीं , प्रीति में न झूठा बंधंन कोई , प्रीति में न प्रतिकूलता कोई। मिलती ही रहती है इसमें हार ही , हृदय फिर भी मानता आभार ही , पग न कोई प्रीति का कभी बहकता , प्रीति का पक्षी सदा ही चकहता। मीत को अपने न प्रीति भूलती , वास्तविकता को है वह स्वीकारती , सुखद लगती है प्रीति शर्माई सी , लाल जोड़े में सजी दुल्हन सी । प्रीति एक ऐसी सुंदर कहानी है , अनुभूतियाँ इसकी बहुत सुहानी हैं , बाँसुरी प्रीति की बजती रहे सदा , ये ही आज सविता की ज़ुबानी है। ...
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Blog Archive · ▼ 2015 (1) o ▼ November (1) § करवा चौथ पर कुछ हाइकु · ► 2014 (13) · ► 2013 (7) · ► 2012 (7) करवा चौथ पर कुछ हाइकु १ माथे बिंदिया हाथ सजे कंगन पूजता – मन २ निकला चंदा अर्ध्य दें सुहागनें रीत हो पूरी ३ पति को पाया साल में एक बार ये दिन आया ४ शृंगार किये सुहागिनों की टोली मंदिर चली ५ थालियाँ सजीं सुहागिनों की पूजा चंदा ने सुनी ६ नारियाँ सजें करवा चौथ पूजें पानी न चखें ७ पेट हैं खाली उमंगें भरे मन सजाएँ थाली ८ हाथों में दीप पति उम्र पाने को चंदा से भीख सविता अग्रवाल "सवि" Posted by Unknown at 07:33 No comments: Email This BlogThis! Share to Twitter Share to Facebook Share to Pinterest Monday, 29 December ...